सुप्रीम कोर्ट ने IT एक्ट की धारा 66A के तहत केस दर्ज किए जाने पर जताई हैरानी

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई है कि उसने सूचना तकनीकी कानून (IT Act) की जिस धारा 66ए को साल 2015 में ही निरस्त कर दिया था, उसी धारा के तहत आज भी मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार केस में उसने आईटी एक्ट के सेक्शन 66ए को असंवैधानिक घोषित कर दिया था और छह साल बाद भी आईटी ऐक्ट के इस प्रावधान के तहत मुकदमा दर्ज किया जाना वाकई हैरान करने वाला है। आइए जानते हैं कि क्या कहती है आईटी ऐक्ट की धारा 66ए……..

आईटी एक्ट की धारा 66ए में क्या प्रावधान?
ध्यान रहे कि आईटी एक्ट में वर्ष 2009 में संशोधित अधिनियम के तहत धारा 66ए को जोड़ा गया था। यह कहती है कि कंप्यूटर रिसोर्स (डेस्कटॉप, लैपटॉप, टैब आदि) या संचार उपकरण (मोबाइल, स्मार्टफोन आदि) के माध्यम से संदेश भेजने वाले उन व्यक्तियों को दंडित किया जा सकता है, जो-

(ए) जो मोटे तौर पर आपत्तिजनक है या धमकी भरा संदेश देता है, या

(बी) जो कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के जरिए जानबूझकर झूठी सूचना देता है ताकि किसी को गुस्सा दिलाया जा सके, परेशान किया जा सके, खतरा और बाधा पैदा किया जा सके, अपमान किया जा सके, चोट पहुंचाई जा सके, आपराधिक धमकी दी जाए और शत्रुता, घृणा या दुर्भावना का वातावरण बनाया जाए, या

(सी) जो किसी को इलेक्ट्रॉनिक मेल या इलेक्ट्रॉनिक मेल मेसेज भेजकर गुस्सा दिलाने, परेशान करने, धोखा देने और उससे अपनी पहचान छिपाने की कोशिश करता है।

ऐसे अपराध के लिए तीन साल तक की जेल की सजा और जुर्माने का प्रावधान किया गया।


बात शिवसेना चीफ रहे बाल ठाकरे के निधन से जुड़ी है। ठाकरे के निधन के बाद मुंबई का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। इसे लेकर फेसबुक पर टिप्पणी की गई। तब महाराष्ट्र पुलिस ने टिप्पणी करने वालों को गिरफ्तार करने लगी और उनपर आईटी ऐक्ट की धारा 66ए के तहत केस दर्ज करने लगी। तब लॉ स्टूडेंट श्रेया सिंघल ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने अपनी याचिका में धारा 66ए को खत्म करने की मांग की।

सिंघल की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में ऐतिहासक फैसला दिया। उसने कहा कि आईटी एक्ट की धारा 66ए संविधान सम्मत नहीं है, इसलिए इसे निरस्त किया जाता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के उल्लंघन और अनुच्छेद 19(2) के तहत किए गए प्रतिबंधों के अंतर्गत न आने के कारण आईटी एक्ट की धारा 66ए को असंवैधानिक घोषित किया जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई सामग्री या संदेश किसी एक के लिए आपत्तिजनक हो सकता है तो दूसरे के लिए नहीं। उसने अभिव्यक्ति की आजादी का संविधान प्रदत्त अधिकार का हवाला दिया और कहा कि धारा 66ए से लोगों के जानने का अधिकार भी सीधे तौर पर प्रभावित होता है। तत्कालीन जस्टिस जे. चेलमेश्वर और जस्टिस रॉहिंटन नारिमन की बेंच न कहा था कि यह प्रावधान साफ तौर पर संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को प्रभावित करता है। शीर्ष अदालत ने कहा था कि 66ए का दायरा काफी व्यापक है और ऐसे में कोई भी शख्स इंटरनेट पर कुछ पोस्ट करने से डरेगा। इस तरह यह धारा फ्रीडम ऑफ स्पीच के खिलाफ है। यह विचार अभिव्यक्ति के अधिकार को चुनौती देता है। ऐसे में 66ए को हम गैर संवैधानिक करार देते हैं ।

सुप्रीम कोर्ट ने जब हैरानी जताई कि असंवैधानिक घोषित होने के छह साल बाद भी आईटी ऐक्ट की धारा 66ए चलन में है तो अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने सरकार की तरफ से सफाई दी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही यह प्रावधान खत्म कर दिया, लेकिन बेयर एक्ट में अभी भी धारा 66ए का उल्लेख है। उन्होंने बताया कि हालांकि नीचे लिखा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट इसे निरस्त कर चुका है। तब सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस नीचे नहीं देख पा रही जहां लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट इस धारा को निरस्त कर चुकी है? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो हफ्ते में केंद्र सरकार जवाब दाखिल करे। ये हैरान करने वाला है, हम कुछ करेंगे।

दरअसल, पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने सुप्रीम कोर्ट के यह मामला उठाया। उसने शीर्ष अदालत में याचिका देकर उससे केंद्र सरकार को यह निर्देश देने की मांग की जिसमें तमाम थाने को एडवाइजरी जारी करके आईटी एक्ट की धारा 66ए में केस दर्ज न करने का आदेश दिया जाए। पीयूसीएल ने कहा कि थानों को बताया जाए कि सुप्रीम कोर्ट धारा 66ए को निरस्त कर चुका है। याचिकाकर्ता के वकील संजय पारिख ने कहा कि श्रेया सिंघल जजमेंट के बाद भी देशभर में हजारों केस दर्ज किए गए हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को नोटिस जारी किया और जवाब दाखिल करने के लिए उसे दो हफ्ते का वक्त दिया।

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